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Mirza-Ghalib-Poetry-in-Urdu-Love
Mirza Ghalib

Mirza Ghalib Poetry in Urdu Love

Mirza Ghalib Poetry in Urdu Love

Even if you’re an ardent follower of Urdu Shayari, there’s no chance that you’ve not heard of Mirza Ghalib Saheb. Assadullah Beg Khan Ghalib or Mirza Ghalib as he’s called today, lived next to a masjid but spent most of his evenings either drinking or at mushairas. His interpretation of love and life continues to touch the chords of our hearts even after so many years since his passing.

All-Time Best Poetries of Mirza Ghalib

اگ رہا ہے درو دیوار سے سبزہ غالب
ہم بیاباں میں ہیں اور گھر میں بہار آئی ہے

دیکھتا ہوں اُسے تھی جس کی تمنا مجھ کو
آج بیداری میں ہے خواب ذلیخا کامجھے پھر

عشق نے نکما بنا دیا غالب ورنہ
ہم بھی بھڑے کام کے آدمی تھے

دیکھتا ہوں اُسے تھی جس کی تمنا مجھ کو
آج بیداری میں ہے خواب ذلیخا کامجھے پھر

گرمی سہی کلام میں مگر نا اتنی سہی
کی جس سے بات اسنے شکایت ضرور کی

صحرا کو بڑا عالم ھے اپنی تنہائی پر غالب
اس نے دیکھا نہں عالم میری تنہائی کا

زندگی اپنی جب اس شکل سے گزری غالب
ہم بھی کیا یاد کریں گے کہ خدا رکھتے تھے

Mirza Ghalib Two-Line Poetry in Hindi

Inkaar ki c lazzat iqraar men kahan ha,
Barhta ha shok ghalib, Inki nahi nahi sy.

रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं क़ायल
जब आँख ही से न टपका तो फिर लहू क्या है

Faqat ek ka hony men he Husn-E-Bandagi ha Ghalib,
Jo roz Qibla badalty hen wo Bedeen hoty he

Kinara kr k rishton sy, wafaen har k Ghalib,
Mohabbat ki haqeeqat ko jawab samjhay to kya samjhay.

Na bazm apni, na saaqi apna, na sheesha apna, na jaam apna,
Agar yehi ha nizaam hasti to Ghalib, Zaindagi ko salam apna.

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Mirza Ghalib poetry in Urdu 2 lines

Aur Bazar Se Le Aaye Agar Toot Gaya
Saghar-e-Jam Se Mere Jam-e-Sifal Achaa Hai

वो आए घर में हमारे, खुदा की क़ुदरत हैं!
कभी हम उमको, कभी अपने घर को देखते हैं

हर एक बात पे कहते हो तुम कि तू क्या है
तुम्हीं कहो कि ये अंदाज़-ए-गुफ़्तगू क्या है

Is qadar toda hai mujhe us ki bewafaai ne “Ghalib”
Ab koi agar pyar se bhi daikhaye to bikhar jata hoon main

हुई मुद्दत कि ‘ग़ालिब’ मर गया पर याद आता है,
वो हर इक बात पर कहना कि यूँ होता तो क्या होता !

Kitna khouf hota hai shaam ke andheron me,
Poonch un parindon se jin ke ghar nahi hote

बिजली इक कौंध गयी आँखों के आगे तो क्या,
बात करते कि मैं लब तश्न-ए-तक़रीर भी था।

Hum to fanaah ho gaye uski ankhen dekh kar “Ghalib”,
Naa jane woh Aainaa kaise dekhte honge

यही है आज़माना तो सताना किसको कहते हैं,
अदू के हो लिए जब तुम तो मेरा इम्तहां क्यों हो

Hazaron khwahishen aise ki har khwahish pe dum nikale,
Bahhut nikale mere arman lekin phir bhi km nikale

हमको मालूम है जन्नत की हक़ीक़त लेकिन,
दिल के खुश रखने को ‘ग़ालिब’ ये ख़याल अच्छा है

इश्क़ पर जोर नहीं है ये वो आतिश ‘ग़ालिब’,
कि लगाये न लगे और बुझाये न बुझे

तुम न आए तो क्या सहर न हुई
हाँ मगर चैन से बसर न हुई
मेरा नाला सुना ज़माने ने
एक तुम हो जिसे ख़बर न हुई

जला है जिस्म जहाँ दिल भी जल गया होगा
कुरेदते हो जो अब राख जुस्तजू क्या है

हुई मुद्दत कि ‘ग़ालिब’ मर गया पर याद आता है,
वो हर इक बात पर कहना कि यूँ होता तो क्या होता !

Jla hai jism jahan dil bhi jal gaya hoga,
Kuredte ho jo ab raakh, justjoo kya hai ?

इस सादगी पे कौन न मर जाए ऐ ख़ुदा
लड़ते हैं और हाथ में तलवार भी नहीं

Baitha Hai Jo Ki Saya-e-Deewar-e-Yar Mai
Farman-Rava-e-Kishwar-e-Hindustan Hai

अपनी गली में मुझ को न कर दफ़्न बाद-ए-क़त्ल
मेरे पते से ख़ल्क़ को क्यूँ तेरा घर मिले

‘ग़ालिब’ वज़ीफ़ा-ख़्वार हो दो शाह को दुआ
वो दिन गए कि कहते थे नौकर नहीं हूँ मैं

Hum ko malum hai jannat ki haqiqat lekin,
Dil ko khush rakhna “Ghalib” ye khayal achchha hai

ग़म-ए-हस्ती का ‘असद’ किस से हो जुज़ मर्ग इलाज
शम्अ हर रंग में जलती है सहर होते तक

जाँ दर-हवा-ए-यक-निगाह-ए-गर्म है ‘असद’
परवाना है वकील तिरे दाद-ख़्वाह का

Mirza Ghalib Shayari in English 2 Lines

Ranj Se Khugar Hua Insaan To Mit Jata Hain Ranj,
Mushkile Mujh Par Padi Itani Ki Asaan Ho Gayi.

हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले
बहुत निकले मिरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले

इशरत-ए-क़तरा है दरिया में फ़ना हो जाना
दर्द का हद से गुज़रना है दवा हो जाना

Bazicha-e-Atfal Hai Duniya Mere Aage
Hota Hai Shab-o-Roz Tamasha Mere Aage

मोहब्बत में नहीं है फ़र्क़ जीने और मरने का
उसी को देख कर जीते हैं जिस काफ़िर पे दम निकले

उन के देखे से जो आ जाती है मुँह पर रौनक़
वो समझते हैं कि बीमार का हाल अच्छा है

न था कुछ तो ख़ुदा था कुछ न होता तो ख़ुदा होता
डुबोया मुझ को होने ने न होता मैं तो क्या होता

ओहदे से मद्ह-ए-नाज़ के बाहर न आ सका
गर इक अदा हो तो उसे अपनी क़ज़ा कहूँ

इश्क़ मुझ को नहीं वहशत ही सही
मेरी वहशत तिरी शोहरत ही सही

दिल-ए-नादाँ तुझे हुआ क्या है
आख़िर इस दर्द की दवा क्या है

न था कुछ तो ख़ुदा था कुछ न होता तो ख़ुदा होता
डुबोया मुझ को होने ने न होता मैं तो क्या होता

आह को चाहिए इक उम्र असर होते तक
कौन जीता है तिरी ज़ुल्फ़ के सर होते तक

इश्क़ ने ग़ालिब निकम्मा कर दिया।
वर्ना हम भी आदमी थे काम के।।

हैं और भी दुनिया में सुख़न-वर बहुत अच्छे
कहते हैं कि ‘ग़ालिब’ का है अंदाज़-ए-बयाँ और

तुम सलामत रहो हजार बरस
हर बरस के हों दिन पचास हजार

निकलना ख़ुल्द से आदम का सुनते आए हैं लेकिन
बहुत बे-आबरू हो कर तिरे कूचे से हम निकले

इश्क़ ने ग़ालिब निकम्मा कर दिया।
वर्ना हम भी आदमी थे काम के।।
Ishq-Ne-Galib-Nikamma-Kar-Diya
Ishq Ne Galib Nikamma Kar Diya

Bar-Ha Dekhi Hain Un ki Ranjishain
Par Kuch Ab Ke Sargirani Aur Hai

mirza ghalib shayari in urdu two lines

उन के देखे से जो आ जाती है मुँह पर रौनक़।
वो समझते हैं कि बीमार का हाल अच्छा है।।
Un-Ke-Dekhe-Se-Jo-Aa-Jati-Hai-Munh-Pe-Raunak -Galib
Un Ke Dekhe Se Jo Aa Jati Hai Munh Pe Raunak – Galib

काबा किस मुँह से जाओगे ‘ग़ालिब’।
शर्म तुम को मगर नहीं आती।।
Kaba Kis Muh Se Jaoge “Galib”,
Sharm Tum Ko Magar Nahi Aati..

दिल-ए-नादाँ तुझे हुआ क्या है।
आख़िर इस दर्द की दवा क्या है।।

Dil-E-Nadan-Tujhe-Hua-Kya-Hain-Galib
Dil-E-Nadan Tujhe Hua Kya Hain – Galib

आह को चाहिए इक उम्र असर होते तक।
कौन जीता है तिरी ज़ुल्फ़ के सर होते तक।।
Aah-Ko-Chahaiye-Ek-Umar-Asar-Hote-Tak-Mirza-Ghalib
Aah Ko Chahaiye Ek Umar Asar Hote Tak – Mirza Ghalib

इशरत-ए-क़तरा है दरिया में फ़ना हो जाना।
दर्द का हद से गुज़रना है दवा हो जाना।।
ghalib one line shayari
दिल से तेरी निगाह जिगर तक उतर गई।
दोनों को इक अदा में रज़ामंद कर गई।।
Dil-Se-Teri-Nigah-Jigar-Tak-Utar-Gayi
Dil Se Teri Nigah Jigar Tak Utar Gayi

दर्द मिन्नत-कश-ए-दवा न हुआ।
मैं न अच्छा हुआ बुरा न हुआ।।
Dard-Minnat-Kash-E-Dawa-N-Hua-Mirza-Ghalib
Dard Minnat Kash-E-Dawa N Hua – Mirza Ghalib

क़र्ज़ की पीते थे मय लेकिन समझते थे कि हां।
रंग लावेगी हमारी फ़ाक़ा-मस्ती एक दिन।।
Karz Ki Peete The May, Lekin Samjhate The Ki Ha,
Rang Lavegi Hamari Faka-Masti Ek Din.

इश्क़ पर जोर नहीं है ये वो आतिश ‘ग़ालिब’।
कि लगाये न लगे और बुझाये न बुझे।।
Ishq-Par-Jor-Nahi-Hain-Ye-Aatish-Galib
Ishq Par Jor Nahi Hain Ye Aatish “Galib”

Mirza Ghalib 2 Line Shayari in Hindi Font

मोहब्बत में नहीं है फ़र्क़ जीने और मरने का।
उसी को देख कर जीते हैं जिस काफ़िर पे दम निकले।।
Mohabbat Me Nahi Hai Farq Jeene Aur Marane Ka,
Usi Ko Dekh Kar Jeete Hai Jis Kafir Pe Dam Nikale..

यही है आज़माना तो सताना किसको कहते हैं,
अदू के हो लिए जब तुम तो मेरा इम्तहां क्यों हो

हमको मालूम है जन्नत की हक़ीक़त लेकिन,
दिल के खुश रखने को ‘ग़ालिब’ ये ख़याल अच्छा है

हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले।
बहुत निकले मिरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले।।
Hazaron-Khwahishe-Esi-Ki-Ghalib
Hazaron Khwahishe Esi Ki Ghalib

कितना ख़ौफ होता है शाम के अंधेरों में।
पूछ उन परिंदों से जिनके घर नहीं होते।।
Kitana-Khauf-Hota-Hai-Mirza-Ghalib
Kitana Khauf Hota Hai – Mirza Ghalib

Ghalib Poetry

हैं और भी दुनिया में सुख़न-वर बहुत अच्छे।
कहते हैं कि ‘ग़ालिब’ का है अंदाज़-ए-बयाँ और।।
galib shayari
न था कुछ तो ख़ुदा था कुछ न होता तो ख़ुदा होता।
डुबोया मुझ को होने ने न होता मैं तो क्या होता।।
N Tha Kuchh To Khuda Tha, Kuchh N Hota To Khuda Hota,
Duboya Mujh Ko Hone Ne N Hota Main To Kya Hota..

दर्द जब दिल में हो तो दवा कीजिए।
दिल ही जब दर्द हो तो क्या कीजिए।।
Dard-Jab-Dil-Me-Ho-To-Ghalib
Dard Jab Dil Me Ho To Ghalib

हाथों की लकीरों पे मत जा ऐ गालिब।
नसीब उनके भी होते हैं जिनके हाथ नहीं होते।।
Hatho-Ki-Lakiron-Pe-Mat-Ja-E-Galib
Hatho Ki Lakiron Pe Mat Ja E Galib

नज़र लगे न कहीं उसके दस्त-ओ-बाज़ू को।
ये लोग क्यूँ मेरे ज़ख़्मे जिगर को देखते हैं।।

Nazar Lage N Kahi Usake Dast-O-Baju Ko,
Ye Log Kyun Mere Zakhme Jigar Dekhate Hai..

Mirza Ghalib Quotes

पियूँ शराब अगर ख़ुम भी देख लूँ दो चार।
ये शीशा-ओ-क़दह-ओ-कूज़ा-ओ-सुबू क्या है।।
Piyun Sharab Agar Khum Bhi Dekh Lu Do Char,
Ye Shisha-O-Kahad-O-Kuza-O-Subu Kya Hain 

रही न ताक़त-ए-गुफ़्तार और अगर हो भी।
तो किस उम्मीद पे कहिये के आरज़ू क्या है।।
Rahi N Takat-E-Guftaar Aur Agar Ho Bhi,
To Kis Ummid Pe Kahiye Ke Aarzoo Kya Hai..

रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं क़ायल।
जब आँख ही से न टपका तो फिर लहू क्या है।।
Rango Me Daudate Firane Ke Ham Nahi Kayal,
Jab Ankh Hi Se N Tapaka To Fir Lahu Kya Hai..

चिपक रहा है बदन पर लहू से पैराहन।
हमारी ज़ेब को अब हाजत-ए-रफ़ू क्या है।।
Chipak Raha Hai Badan Par Lahu Se Pairahan,
Hamari Zeb Ko Ab Hajat-E-Rafu Kya Hai ..

वाइज़!! तेरी दुआओं में असर हो तो मस्जिद को हिलाके देख।
नहीं तो दो घूंट पी और मस्जिद को हिलता देख।।
Vaiz teri Duwaon Me Asar Ho To Masjid Ko Hilake Dekh,
Nahi To Do Ghut Pee Aur Masjid Hilata Dekh..

न शोले में ये करिश्मा न बर्क़ में ये अदा।
कोई बताओ कि वो शोखे-तुंदख़ू क्या है।।
N Shole Me Ye Larishma N Barq Me Ye Adaa,
Koi Batao Ki Wo Shokhe-Tandukhu Kya Hain..

हुई मुद्दत कि ‘ग़ालिब’ मर गया पर याद आता है।
वो हर इक बात पर कहना कि यूँ होता तो क्या होता।।
Huyi Muddat Ki “Galib” Mar Gaya Par Yaad Aata Hai,
Wo Har Ek Baat Pe Kahata Ki Yun Hota To Kya Hota..

तेरे वादे पर जिये हम, तो यह जान, झूठ जाना।
कि ख़ुशी से मर न जाते, अगर एतबार होता।।
Tere Wade Par Jiye Ham, To Yah Jaan, Jhuth Jana,
Ki Khushi Se Mar N Jate, Agar Etbaar Hota..

हमको मालूम है जन्नत की हक़ीक़त लेकिन।
दिल के खुश रखने को ‘ग़ालिब’ ये ख़्याल अच्छा है।।

Hamko Malum Hai Zannat Ki HAQIQAT Lekin,
Dil Ke Khush Rakhane Ke “Galib” Ye Khyaal Achchha Hain..

रेख़्ते के तुम्हीं उस्ताद नहीं हो ‘ग़ालिब’।
कहते हैं अगले ज़माने में कोई ‘मीर’ भी था।।
Rekhte Ke Tumhi Ustaad Nahi Ho “Galib”,
Kahate Hai Agale Zamaane Me Koi Meer Bhi Tha

बस-कि दुश्वार है हर काम का आसाँ होना।
आदमी को भी मयस्सर नहीं इंसाँ होना।।

Bas-KI-Dushwaar Hai Har Kaam Ka Aasaan Hona,
Aadami Ko Bhi Mayassar Nahi Insaan Hona..

बाज़ीचा-ए-अतफ़ाल है दुनिया मिरे आगे।
होता है शब-ओ-रोज़ तमाशा मिरे आगे।।

Bagicha-E-Atafaal Hai Diniya Mire Aage,
Hota Hai Shab-O-Roz Tamasha Mire Aage..

यही है आज़माना तो सताना किसको कहते हैं।
अदू के हो लिए जब तुम तो मेरा इम्तहां क्यों हो।।
Yahi Hai Aazamana To Satana Kisko Kahate Hai,
Adu Ke Ho Liye Jab Tum To Mera Inthaan Kyu Ho..

तुम न आए तो क्या सहर न हुई
हाँ मगर चैन से बसर न हुई।
मेरा नाला सुना ज़माने ने
एक तुम हो जिसे ख़बर न हुई।।

Tum N Aaye To kya Sahar N Huyi,
Han Magar Chain Se Basar N Huyi,
Mera Nala Suna Zamane Ne,
Ek Tum Ho Jise Khabar N Huyi..

कोई मेरे दिल से पूछे तिरे तीर-ए-नीम-कश को।
ये ख़लिश कहाँ से होती जो जिगर के पार होता।।
Koi Mere Dil Se Puchhe Tere Teer-E-Neem-Kash Ko,
Ye Khalish Kaha Se Hoti Jo Jigar Ke Paar Hota..

हुआ जब गम से यूँ बेहिश तो गम क्या सर के कटने का।
ना होता गर जुदा तन से तो जहानु पर धरा होता।।
Hua Jab Gham Se Yun Behish To Gham Kya Sar Ke Katane Ka,
Na Hota Gar Juda Tan Se To Jahanu Par Dhara Hota.

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